किसी ने क्या खूब लिखा है .
बचपन के दिन भी कितने अच्छे हुआ करते थे
तब तो सिर्फ खिलौने टूटा करते थे
बचपन की खुशियाँ भी जाने कैसे खुशियाँ थी
तितलियों के पर नोच के खुश हुआ करते थे
अपने जल जाने का एहसास तक न था
जलते हुए शोलों को पकड़ा करते थे
अब तो एक आंसू भी रुसवा कर जाता है
छोटे थे तो दिल खोल कर रोया करते थे
जी हाँ , बचपन के दिन भी क्या दिन हुआ करते थे, कितने अच्छे हुआ करते थे, न कोई रोक टोक. न कोई फिक्र, न आगे निकलने की होड़. बस अपनी धुन, अपनी मर्ज़ी, अपना राग, न इस बात का सलीका की अम्मा अब्बा क्या कहेंगे. न ये डर की पडोसी क्या सोंचेंगे. कभी हम वोह बारिश के पानी मे कागज़ की नाव बनाते ,कभी दूर आसमान मे पतंग देखकर, उसके पीछे भागते. या कभी सड़क पर जाती हुई गाय की, पूंछ पकड़कर उसको नचाते .या कभी मुहल्ले के दूसरे बच्चों के साथ गुड्डे गुडिया का खेल खेलते , हर पर यही सोंचते, की मर्ज़ी हमारी चले ,जीत हमारी हो जहाँ हमारी मर्ज़ी की बात नहीं होती थी निकल आते थे आंसू कभी अम्मा दौड़ कर आती तो कही दादी गोद मे उठा लेती और हम उनके दामन मे अपने मुह को छुपा लेते
कभी कभी छोटी सी शरारत पर अब्बा की डांट पड़ती तो उस वक़्त सबसे बड़ी दोस्त माँ ही साबित होती और कहती की " मेरा बेटा तो राजा बेटा है " उस वक़्त बड़ा सुकून मिलता फिर वही अब्बा जिन्होंने अभी चंद लम्हों पहले डाँट लगाई हो उनको मुस्करा कर अपना लेते हर्जाने के तौर पर वोह फिर घोडा बनते और हम उनकी पीठ पर बैठ घर के चक्कर लगते उस पल की ख़ुशी का अंदाज़ा आज लगाना नामुमकिन है . पूरे घर मे तूफ़ान लाने के बाद आखिर थक कर हम सो जाते और फिर उठते ही वही धमा चौकड़ी वही शरारत . उस वक़्त दुनिया हमारी हुआ करती थी और हम उस दुनिया के बादशाह हर चीज़ पर हमारा हक था हर चीज़ हमारी थी . मजे की बात ये भी है की उस दौर मे हमारी अदना सी खवाइश भी पूरा दम ख़म लगा कर पूरी की जाती थी हमारी ज़िद की थाली मे बड़ों के प्यार का तड़का जो लगा होता था . वोह बचपन मे कागज़ की बन्दूक बनाकर घर वालों को दिखाना और उनका आह कहकर गिर जाना और हमारा जोर से तली बजाकर हसना .................. ना जाने कितनी यादें है ना जाने कितनी बातें है
आज वक़्त की किताब से बचपन का चैप्टर खोला तो मै दंग रह गया कितना कुछ बदल गया है हम कैसे थे और कैसे हो गए है ............ उस वक़्त दोस्ती के लिए जान देते थे अगर आज वही दोस्त हो वही दोस्ती हो यहाँ हम जान देने की बात नहीं कहेंगे क्यूँकी आज हमारा वोह ख़ुलूस वक़्त की भेट चढ़ गया है लेकिन अगर हम साड़ी बातों से परे हटकर सोंचे तो वाक़ई मै दिल तो कही ना कही बच्चा है जी .........आखिर मे मै अपनी बात को कहातम करते हुए कहना चाहूँगा
कभी कभी छोटी सी शरारत पर अब्बा की डांट पड़ती तो उस वक़्त सबसे बड़ी दोस्त माँ ही साबित होती और कहती की " मेरा बेटा तो राजा बेटा है " उस वक़्त बड़ा सुकून मिलता फिर वही अब्बा जिन्होंने अभी चंद लम्हों पहले डाँट लगाई हो उनको मुस्करा कर अपना लेते हर्जाने के तौर पर वोह फिर घोडा बनते और हम उनकी पीठ पर बैठ घर के चक्कर लगते उस पल की ख़ुशी का अंदाज़ा आज लगाना नामुमकिन है . पूरे घर मे तूफ़ान लाने के बाद आखिर थक कर हम सो जाते और फिर उठते ही वही धमा चौकड़ी वही शरारत . उस वक़्त दुनिया हमारी हुआ करती थी और हम उस दुनिया के बादशाह हर चीज़ पर हमारा हक था हर चीज़ हमारी थी . मजे की बात ये भी है की उस दौर मे हमारी अदना सी खवाइश भी पूरा दम ख़म लगा कर पूरी की जाती थी हमारी ज़िद की थाली मे बड़ों के प्यार का तड़का जो लगा होता था . वोह बचपन मे कागज़ की बन्दूक बनाकर घर वालों को दिखाना और उनका आह कहकर गिर जाना और हमारा जोर से तली बजाकर हसना .................. ना जाने कितनी यादें है ना जाने कितनी बातें है
आज वक़्त की किताब से बचपन का चैप्टर खोला तो मै दंग रह गया कितना कुछ बदल गया है हम कैसे थे और कैसे हो गए है ............ उस वक़्त दोस्ती के लिए जान देते थे अगर आज वही दोस्त हो वही दोस्ती हो यहाँ हम जान देने की बात नहीं कहेंगे क्यूँकी आज हमारा वोह ख़ुलूस वक़्त की भेट चढ़ गया है लेकिन अगर हम साड़ी बातों से परे हटकर सोंचे तो वाक़ई मै दिल तो कही ना कही बच्चा है जी .........आखिर मे मै अपनी बात को कहातम करते हुए कहना चाहूँगा
खुशबू के उड़ते ही क्यों मुरझा गए फूल
कितने भोले पन से हम पुछा करते थे
आज भी वो ताबीरें लहू लहू रुलाती हैं
बचपन मैं जो हम सपने देखा करते थे
बचपन के दिन भी कितने अच्छे हुआ करते थे
तब तो सिर्फ खिलौने टूटा करते थे


